उड़द की खेती करने के लिए, इन बातों का ध्यान रखना चाहिए
भूमि चयन: उरद की खेती के लिए बलुई दोमट या काली मिट्टी सबसे अच्छी होती है। मिट्टी का पीएच मान 6 से 7 के बीच होना चाहिए। उरद की फसल को अच्छी जल निकासी की आवश्यकता होती है, इसलिए ऐसी भूमि चुनें, जहां जलभराव न हो।
बीज का चयन: उरद के अच्छे उत्पादन के लिए उन्नत किस्मों के बीज का चयन करें। इन बीजों का उपचार करना चाहिए ताकि वे रोगों से मुक्त रहें।
भूमि की तैयारी: खेत को अच्छे से जुताई और पलटाई करें ताकि मिट्टी में हवा और पानी का संचार ठीक से हो। खेत को समतल बनाएँ और अच्छे से निंदाई भी करें।
बुवाई: उरद की बुवाई रबी या खरीफ सीजन में की जा सकती है। उरद को सीधी बुवाई या पंक्तियों में बोया जा सकता है। बुवाई के लिए बीजों को 25-30 किलो प्रति हेक्टेयर की दर से बोएं। बुवाई की गहराई 2 से 3 सेंटीमीटर होनी चाहिए।
सिंचाई: उरद की फसल को पर्याप्त पानी की आवश्यकता होती है, खासकर तब जब पौधे फूल और फलने लगते हैं। लेकिन अधिक पानी से बचें क्योंकि इससे जड़ सड़ने का खतरा रहता है। पानी की सिंचाई 7-10 दिनों के अंतराल में की जा सकती है।
खाद और उर्वरक: उरद की फसल को अच्छे उत्पादन के लिए खाद की आवश्यकता होती है। खेत में अच्छी मात्रा में सड़ी हुई गोबर की खाद (20-25 टन प्रति हेक्टेयर) डालें। इसके अलावा, नाइट्रोजन, फास्फोरस, और पोटाश की सही मात्रा का उपयोग करें। उरद के लिए 20-25 किलो नाइट्रोजन, 50-60 किलो फास्फोरस और 20-25 किलो पोटाश प्रति हेक्टेयर उपयुक्त होता है।
रोग और कीट प्रबंधन: उरद की फसल में विभिन्न रोग और कीट हो सकते हैं जैसे कि उरद की बीमारी (Urd Moth) और पत्तियों की सड़न। इन्हें नियंत्रित करने के लिए जैविक या रासायनिक उपायों का उपयोग किया जा सकता है।
कटाई और उत्पादन: उरद की फसल 90 से 120 दिन में पककर तैयार हो जाती है। जब फसल का रंग पीला हो जाए और बीज पूरी तरह से पक जाए, तब इसे काट लें। कटाई के बाद बीजों को अच्छे से सुखाएं।