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धान की खेती की पूरी जानकारी, कैसे कम करें लागत और कमाएं ज्यादा मुनाफा

  • 16/07/2021

धान, भारत समेत कई एशियाई देशों की मुख्य खाद्य फसल है। इतना ही नहीं दुनिया में मक्का के बाद जो फसल सबसे ज्यादा बोई और उगाई जाती है वो धान ही है। करोड़ों किसान धान की खेती करते हैं। खरीफ सीजन की मुख्य फसल धान लगभग पूरे भारत में लगाई जाती है। अगर कुछ बातों का शुरु से ही ध्यान रखा जाए तो धान की फसल ज्यादा मुनाफा देगी। धान की खेती की शुरुआत नर्सरी से होती है, इसलिए बीजों का अच्छा होना जरुरी है। कई बार किसान महंगा बीज-खाद तो लगाता है, लेकिन सही उपज नहीं मिल पाती है, इसलिए बुवाई से पहले बीज व खेत का उपचार कर लेना चाहिए। बीज महंगा होना जरुरी नहीं है बल्कि विश्वसनीय और आपके क्षेत्र की जलवायु और मिट्टी के मुताबिक होना चाहिए। भारतीय चावल अनुसंधान संस्थान, हैदराबाद के कृषि वैज्ञानिक डॉ. पी. रघुवीर राव बताते हैं, "देश के अलग-अलग राज्यों में धान की खेती होती है और जगह मौसम भी अलग होता है, हर जगह के हिसाब से धान की किस्में विकसित की जाती हैं, इसलिए किसानों को अपने प्रदेश के हिसाब से विकसित किस्मों की ही खेती करनी चाहिए।"

वो आगे बताते हैं, "मई की शुरुआत से किसानों को खेती की तैयारी शुरू कर देनी चाहिए, ताकि मानसून आते ही धान की रोपाई कर दें।" किसानों को बीज शोधन के प्रति जागरूक होना चाहिए। बीज शोधन करके धान को कई तरह के रोगों से बचाया जा सकता है। किसानों को एक हेक्टेयर धान की रोपाई के लिए बीज शोधन की प्रक्रिया में महज 25-30 रुपये खर्च करने होते हैं।

रोपणी तैयार करें और एसआरआई विधि (श्रीविधि) से रोपाई करने के लिए अंकुरित बीज की नर्सरी तैयार करें। 12 से 14 दिन के पौधे तैयार करें, उसके बाद पौधों को पूरी जड़ व बीज सहित निकालें। तुरंत इस नर्सरी को पहले से तैयार खेत में 25 सेमी. दूरी पर कतारबद्ध रुप में बोएं। एक जगह पर एक से दो पौधे ही रोपें। दूरी निर्धारित करने के लिए पैडी मार्कर का भी उपयोग कर सकते हैं। जो पौधे से पौधे के लिए और कतार से कतार के लिए 25 सेमी. के अंतर पर निशान बनाता है। श्रीविधि से धान की रोपाई उसी खेत में करें जिसमें पानी न भरता हो। श्रीविधि से बुवाई के बाद खेत में पानी निकालने रहें और जब आवश्यकता हो तब, जैसे गेहूं के खेत में सिंचाई करते हैं उसी प्रकार धान के खेत में सिंचाई करें और खेत में नमी बना कर रखें। बाकी फसल प्रबंधन सामान्य धान की तरह करें। इस प्रकार से प्रबंधन करने से निश्चित ही कम लागत में अधिक उपज किसान को प्राप्त होगी।

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