भूमि चयन और तैयारी:
1. भूमि चयन और तैयारी:
तिल के लिए हल्की बलुई या दोमट मिट्टी उपयुक्त होती है। मिट्टी का पीएच स्तर 6 से 7 के बीच होना चाहिए।
खेत की तैयारी अच्छे से करनी चाहिए। पहले खेत को जुताई करें और फिर दो-तीन बार पलटने वाली जुताई (Ploughing) करें ताकि मिट्टी नरम और भुरभुरी हो जाए।
खेत में अच्छी जल निकासी होनी चाहिए क्योंकि तिल अधिक पानी सहन नहीं कर पाता है।
2. बुवाई का समय:
तिल की बुवाई मानसून के शुरुआत में करनी चाहिए, यानी जून से जुलाई के बीच।
उचित समय पर बुवाई करने से अच्छे उत्पादन की संभावना बढ़ जाती है।
3. बीज का चयन और बुवाई:
उच्च गुणवत्ता वाले तिल के बीज का चयन करें। प्रति हेक्टेयर 5-6 किलोग्राम बीज की आवश्यकता होती है।
बुवाई के समय बीजों को समान रूप से खेत में फैलाना चाहिए। बुवाई दूरी 20-30 सेंटीमीटर की रखें और कतारों के बीच 40-45 सेंटीमीटर की दूरी रखें।
4. सिंचाई:
तिल सूखा सहन कर सकता है, लेकिन शुरुआती विकास में हल्की सिंचाई करनी चाहिए।
बुवाई के बाद 3-4 दिन में हल्की सिंचाई करें और फिर आवश्यकता अनुसार खेत में पानी दें। अधिक पानी से बचें, क्योंकि इससे जड़ सड़ सकती है।
5. खाद और उर्वरक:
तिल की खेती के लिए अच्छी गुणवत्ता वाली गोबर की खाद का उपयोग करें। खेत में 8-10 टन गोबर की खाद प्रति हेक्टेयर डालें।
उर्वरक के रूप में नाइट्रोजन, फास्फोरस, और पोटाश का संतुलित अनुपात (NPK) का उपयोग करें।
6. नियंत्रण और कीटनाशक:
तिल में कुछ सामान्य कीट और रोग हो सकते हैं जैसे तिल का कीट, पंख वाला कीट और सफेद मक्खी। इनसे बचाव के लिए समय-समय पर जैविक या रासायनिक कीटनाशकों का उपयोग करें।
फफूंदी और अन्य रोगों से बचाव के लिए कवकनाशी का भी उपयोग किया जा सकता है।
7. कटाई:
तिल की फसल 3-4 महीने में तैयार हो जाती है। जब तिल की फलियां सूख जाएं और दाने निकलने लगें, तो यह कटाई का संकेत होता है।
तिल की फसल को धीरे-धीरे हाथों से या हल के द्वारा काटा जाता है।